यहाँ नौ देवियों की कविताएं हैं:
1. माँ शैलपुत्री (प्रथम दिन — सफेद)
हिमालय की गोद से जन्मी राजदुलारी,
पार्वती का प्रथम रूप, शैलपुत्री प्यारी।
नंदी बैल पे सवार, हाथ में त्रिशूल,
माथे पे अर्धचंद्र, मुख जैसे खिला फूल।
सती का था पुनर्जन्म, बनी हिमवंत-नंदिनी,
शिव को पाने को बनी, कठिन तप-संगिनी।
तप किया घोर वर्षों तक, शिव को पाने को,
पर्वत की बेटी ने जीता, महायोगी के मन को।
श्वेत वस्त्र में लिपटी, तू शांति की मूरत,
मूलाधार चक्र की स्वामिनी, देती दृढ़ता सूरत।
जो भी पहले दिन ध्याए, तुझे सच्चे मन से,
उसके जीवन के काँटे, हटते क्षण-क्षण से।
बीमारी, दरिद्रता, भय सब भाग जाएँ,
तेरी कृपा से आँगन में, खुशहाली आए।
शैलपुत्री माँ, तू ही शक्ति का आधार,
तुझसे ही शुरू होता, नवरात्रि का त्यौहार।
घी का भोग, सफेद पुष्प चढ़ाएँ,
श्रद्धा से माँ तेरे, चरणों में शीश नवाएँ।
2. माँ ब्रह्मचारिणी (दूसरा दिन — लाल)
एक हाथ में माला, दूजे में कमंडल,
नंगे पाँव चली वन में, करने तप अखंडल।
ब्रह्मचारिणी नाम पड़ा, ब्रह्म को जो पाने चली,
हज़ारों साल फल-फूल खाकर, धूप-छाँव में पली।
फिर वो भी छोड़ा, जब पत्तों का त्याग किया,
‘अपर्णा’ कहलाई, जब तप पराकाष्ठा पर किया।
न कोई श्रृंगार, न राजमहल की चाह,
बस महादेव के नाम की, पकड़ी कठिन राह।
सिखाती है तू संयम, तप और वैराग,
बिहार धैर्य के मिलता नहीं, श्रेष्ठ सुहाग।
विद्यार्थी तुझे पूजे, सद्ज्ञान की आस में,
सत्य की शक्ति बसी है, तेरे ही विश्वास में।
चीनी का भोग लगे, लाल रंग सोहे,
तेरा तपस्वी रूप, सबके मन को मोहे।
दूजे दिन की अरदास, मैया स्वीकार करो,
भक्तों के जीवन का, बेड़ा अब पार करो।
3. माँ चंद्रघंटा (तीसरा दिन — पीला)
दस भुजाओं में शस्त्र सजे, सिंह की सवारी,
माथे पे घंटा-सा चंद्रमा, रूप की उजियारी।
चंद्रघंटा नाम पड़ा, जब घंटे सी ध्वनि गूँजी,
अधर्म का नाश हुआ, जगी धर्म की पूँजी।
स्वर्ण जैसा वर्ण तेरा, आँखों में तेज अपार,
सौम्यता भी रखती है, और युद्ध में हुंकार।
जब देवता हारे, महिषासुर के वार से,
तूने किया संहार, अपनी शक्ति की धार से।
मणिपुर चक्र की स्वामिनी, ऊर्जा का भंडार,
आलस, डर और मोह का, करती तू संहार।
घंटे की टंकार से, नकारात्मकता भागे,
हृदय में भक्ति का, पावन दीपक जागे।
दूध का भोग लगे, साहस का वरदान मिले,
तेरी कृपा से भक्त को, मान और सम्मान मिले।
4. माँ कूष्मांडा (चौथा दिन — हरा)
जब सृष्टि में न सूर्य था, न चाँद-सितारे,
तूने मंद मुस्कान से, रचे ब्रह्मांड सारे।
‘कू’ यानी छोटा, ‘उष्मा’ ऊर्जा का प्रमाण,
‘अंड’ यानी ब्रह्मांड की, तू ही है प्राण।
अष्ट भुजा, कमंडल, और हाथ में धनुष-बाण,
अमृत कलश, चक्र-गदा, करती सबका कल्याण।
सिंह पे सवार माँ, हरे रंग की आभा,
अनाहत चक्र में बसती, हृदय की शोभा।
कुम्हड़े की बलि तुझे, मैया अति प्यारी,
मिटते हैं रोग सभी, बढ़ती आयु सारी।
मालपुए का भोग लगा, चौथे दिन मनाएँ,
सृष्टि की आदि-शक्ति को, मिलकर शीश नवाएँ।
जो जग को रच सके, अपनी इक हँसी से,
वो मुक्त कर दे भक्त को, हर फाँसी से।
5. माँ स्कंदमाता (पाँचवाँ दिन — ग्रे)
गोद में बाल स्कंद (कार्तिकेय) को लिए,
कमलासन पे विराजी, ममता के दीप जिए।
चार भुजा, हाथ कमल, एक में नन्हा बालक,
अभय मुद्रा में खड़ी, तू जग की है पालक।
स्कंदमाता कहलाई, तू कार्तिकेय की माता,
मोक्ष की तू दात्री है, तू ही भाग्य विधाता।
विशुद्धि चक्र पे माँ, तेरा पावन स्थान,
वाणी में मिठास दे, बढ़ा हमारा ज्ञान।
संतान सुख की दात्री, बाँझ को माँ बनाए,
सूने पड़े घर में, फिर किलकारी गूँजाए।
केले का भोग लगे, स्लेटी (ग्रे) रंग प्यारा,
तेरी शरण में मिलता, जग को सहारा।
सिंह पे होकर सवार, तू ममता की मूरत,
सबसे भोली, सबसे पावन, तेरी ये सूरत।
6. माँ कात्यायनी (छठा दिन — नारंगी)
कात्यायन ऋषि के तप से, प्रकटी शक्ति भारी,
कहलाई कात्यायनी, दुष्टों पे तू प्रहारी।
महिषासुर का वध करने, जब तू रण में आई,
देवों ने अपने तेज से, तेरी देह सजाई।
चतुर्भुज, सिंह-वाहिनी, खड्ग और कमल सोहे,
तेरी ऊर्जस्वी छवि, भक्त का मन मोहे।
आज्ञा चक्र की स्वामिनी, दिव्य दृष्टि प्रदान करे,
पापियों का नाश कर, धर्म का उत्थान करे।
विवाह की अड़चनें, तेरे नाम से मिट जाएँ,
मनचाहा वर मिले, जो तुझे मन से ध्याएँ।
शहद का भोग तुझे, नारंगी रंग प्यारा,
तेरे ही प्रताप से, चमके भाग्य का सितारा।
अन्याय के विरुद्ध तू, ढाल बनके खड़ी,
नारी शक्ति की तू ही, सबसे ऊँची घड़ी।
7. माँ कालरात्रि (सातवाँ दिन — नीला)
कृष्ण वर्ण, बिखरे केश, रूप है विकराल,
तीन नेत्रों में चमकती, अग्नि की मशाल।
गर्दभ पे सवार माँ, साँसों में ज्वाला,
दुष्टों के विनाश को, पहना मुंडों की माला।
एक हाथ वरद, दूजा अभय प्रदान करे,
खड्ग और काँटे से, पापियों का संहार करे।
शुभंकरी तू कहलाती, भक्तों का भय हरती,
भूत-प्रेत बाधाएँ, सब तुझसे हैं डरती।
सहस्रार चक्र के निकट, तेरा दिव्य वास,
अज्ञान के अंधकार का, करती तू सर्वनाश।
गुड़ का भोग लगे, नीला रंग अति सुहाए,
तेरे जाप से भक्त के, संकट सब कट जाए।
बाहर से भयानक, पर भीतर ममता का सागर,
पापियों के लिए काल, भक्तों के लिए गागर।
8. माँ महागौरी (आठवाँ दिन — गुलाबी)
श्वेत वस्त्र, गौर वर्ण, शांति की तू मूरत,
वृषभ पे सवार माँ, भोली सी सूरत।
कठिन तप से जब देह, काली पड़ गई थी,
शिव के गंगा जल से, फिर गौर तू हुई थी।
महागौरी नाम पड़ा, करुणा की तू धारा,
पाप धो देती है, जैसे गंगा का किनारा।
अष्टमी को कन्या पूजन, घर-घर में होता,
तेरा आशीर्वाद ही, सुख का बीज बोता।
नारियल का भोग लगे, गुलाबी रंग प्यारा,
भक्त के जीवन में बहे, खुशियों की धारा।
चाँदी जैसी चमक तेरी, चंद्रमा सी शीतलता,
क्रोध को शांत करे, तेरी सहज कोमलता।
अष्टमी की ये पूजा, सबसे फलदायी है,
माँ महागौरी की जय, जग ने गाई है।
9. माँ सिद्धिदात्री (नवाँ दिन — बैंगनी)
कमल पुष्प पे आसन, चार भुजा धारी,
शंख, चक्र, गदा, कमल, शोभा है न्यारी।
सिद्धिदात्री तू ही, नवमी की रानी,
अष्ट सिद्धि, नव निधि की, तू ही है दानी।
महादेव ने भी तुझसे, सब सिद्धियाँ पाईं,
तभी तो अर्धनारीश्वर की, छवि जग में छाई।
मोक्ष का द्वार माँ, तू ही तो खोलती,
कर्मों के तराजू में, तू ही भाग्य तोलती।
तिल का भोग लगे, बैंगनी रंग सुहाए,
नवमी की पूर्णाहुति, तेरे दर पे आए।
बिना तेरे अधूरी है, नवरात्रि की साधना,
पूरी हो जाती है, हर एक आराधना।
नौ रूपों की एक शक्ति, तू ही जगदंबा,
तेरी जय-जयकार माँ, तू ही माँ अम्बा।
।। श्री हनुमान वंदना ।।
चैत्र पूर्णिमा की पावन रात आई,
अंजनी-पुत्र की जय-जयकार छाई।
पवन के सुत, बल-बुद्धि के धाम,
श्री हनुमान, तुम्हें कोटि-कोटि प्रणाम।
बालपन में भास्कर को फल जाना,
माँ अंजना का नंदन कहलाना।
ऋषियों का आशीष, राम का नाम,
रोम-रोम में बसते ‘सीता-राम’।
सिंधु लांघा एक ही छलाँग में,
पर्वत उठाया अपनी बलशाली बाँह में।
‘राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम’,
यही समर्पण, यही आपका नाम।
न कोई मद, न मोह-माया कोई,
दास भाव में ही परम तृप्ति सोई।
अतुलित बलशाली, फिर भी राम चरण में,
भक्ति की अलख जगाते हर जन-जन में।
आज हनुमान जयंती पर शीश झुकाएँ,
मन के मंदिर में भक्ति दीप जलाएँ।
संकट मोचन, अष्ट सिद्धि के दाता,
हर पीड़ा हर लो, हे राम के भ्राता।
जय बजरंगबली, जय हनुमान,
तुम्हारे बिना अधूरा राम का गान।
।। जियो और जीने दो - महावीर का अमर संदेश ।।
जन्मे थे चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को,
वीर जैन का उदय हुआ।
काश्यप गोत्र में जन्म लेकर,
महावीर का नाम जग में आया।
ज्ञान की ज्योति जलाई,
अज्ञान के अंधकार को दूर किया।
सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाया,
जीवों के कल्याण का पाठ पढ़ाया।
पांच व्रतों का पालन करने को कहा,
सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह।
जीवन को सरल और पवित्र बनाने को कहा,
कृष्ण, रोध, माया, लोभ से दूर रहने को कहा।
महावीर की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं,
जीवन को सार्थक बनाने के लिए।
आहिंसा और सत्य का मार्ग दिखाने के लिए,
महावीर की जय हो, जय हो।
दिनेश कुमार कीर
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